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राइट टु प्रिवेसी: आधार की लड़ाई में मोदी सरकार बीच का रास्ता निकाल सकती है

राइट टु प्रिवेसी पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश मोदी सरकार के लिए झटका माना जा रहा है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब सरकार सभी योजनाओं और सरकारी कामों को आधार से जोड़ने के लिए आक्रामक तरीके से आगे बढ़ रही थी। कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने दावा किया कि कोई असर नहीं होगा, लेकिन जिस तरह कानूनी दांवपेच में आधार को परखा जा रहा है, उससे आने वाले दिनों में बीच का रास्ता निकालने के लिए सरकार मजबूर हो सकती है।राइट टु प्रिवेसी: आधार की लड़ाई में मोदी सरकार बीच का रास्ता निकाल सकती है।

राइट टु प्रिवेसी: आधार की लड़ाई में मोदी सरकार बीच का रास्ता निकाल सकती है

केंद्र सरकार की ओर से वित्त मंत्री अरुण जेटली और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने तर्क दिया कि विवाद की जड़ यह थी कि यूपीए सरकार ने आधार के लिए कोई कानून नहीं बनाया था। मौजूदा सरकार ने कानून बनाकर सारी परेशानियों को दूर कर दिया है, लेकिन जानकार मानते हैं कि यह इतना आसान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से स्पष्ट संकेत मिलता है कि भले ही आधार पर पूरी तरह से बंदिश न लगाई जाए, लेकिन आंशिक असर जरूर पड़ेगा। वहीं सरकार ने दावा किया कि तीन महीने में नए डेटा कानून का ड्राफ्ट तैयार हो जाएगा। आम लोगों के डेटा को सुरक्षित रखने का रास्ता निकाला जाएगा। हालांकि सरकार ने इस आदेश को अपने लिए झटका मानने से इनकार कर दिया है।

2010 में जब नंदन नीलेकणी के नेतृत्व में आधार के साथ तमाम योजनाओं को जोड़ने पर काम शुरू हुआ था, तब खुद नीलेकणी ने यूपीए सरकार से प्राइवेसी कानून बनाने का आग्रह किया था। उनकी पहल पर जस्टिस एपी शाह के नेतृत्व में प्रिवेसी कानून के ड्राफ्ट पर सुझाव देने के लिए कमिटी बनाई गई थी। जस्टिस शाह ने पूरे विश्व के तमाम प्रिवेसी कानून को देखकर और देश की जरूरत को समेटते हुए समग्र कानून का प्रस्ताव दिया था। सूत्रों के अनुसार 2013 आते-आते जब यूपीए सरकार तमाम दूसरी समस्याओं से घिर गई तो इस मुद्दे को टाल दिया गया। शाह कमिशन ने रिपोर्ट में निजता की सीमा भी तय की थी। स्टिंग या ऐसे माध्यम को प्रिवेसी कानून से अलग रखा गया था। थर्ड पार्टी को किसी तरह के डेटा ट्रांसफर से रोकने के लिए कई सुझाव दिए गए थे। इसमें डीएनए डेटा बैंक बनाने का भी प्रस्ताव शामिल था। सूत्रों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब केंद्र सरकार इन लंबित कदमों पर आगे बढ़ सकती है।

अब जब आधार मामले की सुनवाई 5 जजों की बेंच के सामने होगी तो यह तय होगा कि आधार के लिए लिया गया डेटा निजता का उल्लंघन है या नहीं। संवैधानिक बेंच में मामले की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने आधार के लिए डेटा लेने का समर्थन किया था, लेकिन उनकी तमाम दलीलों को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रोहिंटन नरिमन ने नकार दिया था और कहा था कि निजता का अधिकार जीवन के अधिकार में समाहित है और जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में कोई विरोधाभासी स्थिति नहीं है। गरीब अब मोबाइल लेकर चलते हैं। निजता के अधिकार के लिए वह भी आगे आ सकते हैं।




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